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सदा हमें समझाए नानी

Published on March 29, 2026


सदा हमें समझाए नानी, नहीं व्यर्थ बहाओ पानी । हुआ समाप्त अगर धरा से, मिट जायेगी ये ज़िंदगानी । नहीं उगेगा दाना-दुनका, हो जायेंगे खेत वीरान । उपजाऊ जो लगती धरती, बन जायेगी रेगिस्तान । हरी-भरी जहाँ होती धरती, वहीं आते बादल उपकारी । खूब गरजते, खूब चमकते, और करते वर्षा भारी । हरा-भरा रखो इस जग को, वृक्ष तुम खूब लगाओ । पानी है अनमोल रत्न, तुम एक-एक बूँद बचाओ ।

- Attribution: श्याम सुन्दर अग्रवाल


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